विशाल_सरोज
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असहाय
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गुरुवार, 13 मई 2021
इंसानियत न शर्मिंदा होती
भूखी थी,
असहाय थी,
थी मूक, पर
मां थी..
अबला ने,
विश्वास किया,
धोखा से, तूने
बार किया..
प्रचंड पीड़ा,
के मारे,
प्राण त्यागे, उसने
नदी किनारे..
गांव तेरा,
नाश करती,
तुझे मारती, तब
वो मरती..
तू मरता,
वो ज़िंदा होती,
तो इंसानियत, न
शर्मिंदा होती.
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