विशाल_सरोज
Personal collection of poems, shayari, etc
शाम
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शाम
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सोमवार, 18 अक्टूबर 2021
मिन्नतों के बाद खुदा ने मिलाया था उसे
एक तन्हा शाम चाय पर देखा था उसे,
बड़ी चाहत भरी नजरों से देखा था उसे,
अफसोस आज फिर वही तन्हा शाम है,
मिन्नतों के बाद खुदा ने मिलाया था उसे.
शुक्रवार, 18 जून 2021
कि बहुत दिखें है हम शामों में तुम्हारें साथ
आ ही जाता है तेरा नाम मेरे नाम के साथ,
कि बहुत दिखें है हम शामों में तुम्हारें साथ.
गुरुवार, 20 मई 2021
मेरी हमनशीं तेरे बिना
दिन अधूरा तेरे बिना,
शाम सुनी तेरे बिना,
बेनिशाँ है ये ज़िन्दगी,
मेरी हमनशीं तेरे बिना.
सोमवार, 17 मई 2021
मैं भी डूब सा जाता हूं
तू मिलती थी कभी जहां,
मैं उसी रेस्तरां जाता हूं,
डूबते हुए दिन के साथ,
मैं भी डूब सा जाता हूं.
रविवार, 9 मई 2021
तुम
शाम की
ठंडक..
नदी का
किनारा
और
तुम !
गुरुवार, 29 अप्रैल 2021
मुझ में तुम
खुशनुमा शाम,
शाम में मंडप,
मंडप में तुम,
गुलाबी साड़ी,
साड़ी में घूंघट,
घूंघट में तुम,
सुर्ख चेहरा,
चेहरा पे हंसी,
हंसी में तुम,
झुकी आंखें,
आंखों में काजल,
काजल में तुम,
नाजुक हाथ,
हाथों में मेंहदी,
मेंहदी में तुम,
सात वचन,
वचनों में मैं,
मुझ में तुम.
सोमवार, 26 अप्रैल 2021
शाम में....मैं विशाल..
शाम में..
महसूस करता हूँ मैं,
मद्धिम पवन,
शीतल जल,
महसूस करता हूँ मैं,
चहकते पंछी,
नाचती तितलियां,
महसूस करता हूँ मैं,
खिलते फूल,
गुनगुनाते भंवरे,
महसूस करता हूँ मैं,
निश्छल प्रेम,
निस्वार्थ समर्पण..
नदी किनारे,
तेरी यादों के संग,
महसूस करता हूं,
खुद ही को बस,
शाम में....
मैं विशाल..
मंगलवार, 20 अप्रैल 2021
अब इस जहान में कोई हमारा नही है
हमारे हिस्से में हसीं शामें नही है,
दिल नही मानता कि तू हमारा नही है,
ख़ाक छानते रहे 'विशाल' दुनिया की,
अब इस जहान में कोई हमारा नही है.
जरा पीछे मुड़कर देखना
शाम को खेत की मेड़ पर बैठे..
सूरज को ढलते देखना,
मवेशियों को चरते देखना,
पंछियों को उड़ते देखना,
गांव में तेरा और क्या छूटा,
जरा पीछे मुड़कर देखना.
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