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रविवार, 10 अप्रैल 2022

ये ऊँची इमारतें रास नही आतीं

वो टेढ़े-मेढ़े रास्तें भाते है मुझे,
ये सीधी सड़कें रास नही आतीं,

वो कच्चा घर याद आता है मुझे,
ये ऊँची इमारतें रास नही आतीं.

मंगलवार, 25 मई 2021

इन्हें कौन शौक से उठाता है

हर कोई बच्चों के लिए कमाता है,
पर कभी बचपन भी घर चलाता है,

ये ज़िम्मेदारियां है आ जाती है,
इन्हें कौन शौक से उठाता है.

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

हिमालय की तलहटी में एक घर हो

हिमालय की तलहटी में एक घर हो,
छोटा दालान हो, वृहद चारागाह हो,

नीला आसमान हो, ऊँचा पहाड़ हो,
हिमालय की तलहटी में एक घर हो.

गांव अपना छोड़ आया

अनमोल खजाना छोड़ आया,
अपनी आजादी छोड़ आया,

मैं दो जून की रोटी को
गांव अपना छोड़ आया,

मिट्टी की सौंधी खुशबू,
आमों के बाग छोड़ आया,

नदिया का बहता पानी,
बूढ़ी मां को छोड़ आया,

पिंजरे से घर के खातिर,
मंदिर अपना छोड़ आया.

मैं दो जून की रोटी को,
गांव अपना छोड़ आया.