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गुरुवार, 13 मई 2021

इंसानियत न शर्मिंदा होती

भूखी थी,
असहाय थी,
थी मूक, पर
मां थी..

अबला ने,
विश्वास किया,
धोखा से, तूने
बार किया..

प्रचंड पीड़ा,
के मारे,
प्राण त्यागे, उसने
नदी किनारे..

गांव तेरा,
नाश करती,
तुझे मारती, तब
वो मरती..

तू मरता,
वो ज़िंदा होती,
तो इंसानियत, न
शर्मिंदा होती.

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

सदा मेरी हो कर रहना

अपनी ही धुन में बहना,
कभी मां, कभी प्रेयसी होना,

कैसे रहू तुझसे दूर मैं,
सदा मेरी हो कर रहना.

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

गांव अपना छोड़ आया

अनमोल खजाना छोड़ आया,
अपनी आजादी छोड़ आया,

मैं दो जून की रोटी को
गांव अपना छोड़ आया,

मिट्टी की सौंधी खुशबू,
आमों के बाग छोड़ आया,

नदिया का बहता पानी,
बूढ़ी मां को छोड़ आया,

पिंजरे से घर के खातिर,
मंदिर अपना छोड़ आया.

मैं दो जून की रोटी को,
गांव अपना छोड़ आया.