विशाल_सरोज
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मां
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मां
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गुरुवार, 13 मई 2021
इंसानियत न शर्मिंदा होती
भूखी थी,
असहाय थी,
थी मूक, पर
मां थी..
अबला ने,
विश्वास किया,
धोखा से, तूने
बार किया..
प्रचंड पीड़ा,
के मारे,
प्राण त्यागे, उसने
नदी किनारे..
गांव तेरा,
नाश करती,
तुझे मारती, तब
वो मरती..
तू मरता,
वो ज़िंदा होती,
तो इंसानियत, न
शर्मिंदा होती.
शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021
कि रोती है मां, तुम्हे आंचल में छुपा कर
ये बारिश नहीं प्रकृति का विलाप है,
कि रोती है मां, तुम्हे आंचल में छुपा कर.
बुधवार, 28 अप्रैल 2021
सदा मेरी हो कर रहना
अपनी ही धुन में बहना,
कभी मां, कभी प्रेयसी होना,
कैसे रहू तुझसे दूर मैं,
सदा मेरी हो कर रहना.
मंगलवार, 20 अप्रैल 2021
गांव अपना छोड़ आया
अनमोल खजाना छोड़ आया,
अपनी आजादी छोड़ आया,
मैं दो जून की रोटी को
गांव अपना छोड़ आया,
मिट्टी की सौंधी खुशबू,
आमों के बाग छोड़ आया,
नदिया का बहता पानी,
बूढ़ी मां को छोड़ आया,
पिंजरे से घर के खातिर,
मंदिर अपना छोड़ आया.
मैं दो जून की रोटी को,
गांव अपना छोड़ आया.
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