विशाल_सरोज
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शुक्रवार, 28 मई 2021
कभी मैं इंसान हो जाता हूं
कभी मैं हैरान हो जाता हूं,
कभी परेशान हो जाता हूं,
देखकर मजबूरी किसी की,
कभी मैं इंसान हो जाता हूं.
इंसान बन जाता हूं
बेवकूफ़ हूं मैं, कभी
इंसान बन जाता हूं.
रविवार, 16 मई 2021
'वो' हो जाता हूं ...
जब 'कर्ण' लिखता हूं,
'कर्ण' हो जाता हूं ...
जब 'इश्क़' लिखता हूं,
'इश्क़' हो जाता हूं ...
मैं इंसान हूं या किरदार कोई,
जब 'जो' लिखता हूं,
'वो' हो जाता हूं ...
सोमवार, 26 अप्रैल 2021
तख्त-नशीं का पहले ज़मीर कत्ल होता है
ये सियासत है, यहां किरदारों का कत्ल होता है,
इंसान ज़िंदा रहता है, वजूद कत्ल होता है,
यूं ही नही मिलता तख्त किसी को,
तख्त-नशीं का पहले ज़मीर कत्ल होता है.
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