कर्ण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कर्ण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 16 मई 2021

रो रहे थे कई आसमान

हे कुंती पुत्र, हे सूर्य पुत्र,
हे सूत पुत्र, हे राधेय,
करता हूं नमन तुम्हे,
हे सखा, हे श्रद्धेय,

हे अधिरथ के सुत,
हे सुयोधन के अंगराज,
मेरे लिए तुम कर्ण हो,
हे महाभारत के अधिराज,

युधिष्ठिर, सुयोधन, भीम,
थे सभी के ज्येष्ठ तुम,
भीष्म, अर्जुन, द्रोण,
थे सभी में श्रेष्ठ तुम,

थे व्यक्तित्व से महादानी,
थे कवच कुंडल धारी वीर,
थे तुम ही महा प्रतापी,
हे महानायक, हे महावीर,

बचपन का प्रिय धनुष,
था धन्वा भी तुम्हे प्यारा,
मिला गुरु से जो धनुष,
था विजय सबसे न्यारा,

था ब्रम्हास्त्र भी पास तुम्हारे,
परशुराम के तुम चेले थे,
थे गदा युद्ध में पारंगत,
सुयोधन संग तुम खेले थे,

द्रोपदी थी जिसपर मोहित,
तुम थे वो भाग्यशाली वीर,
महाभारत तो छलावा था,
युद्धरत थे बस दो ही वीर,

अर्जुन एक छलावा थे, 
भगवान तीर चलाते थे,
थे कृष्ण ही सामने तेरे,
जो शस्त्र आजमाते थे,

थे कितने श्राप, कितने वचन,
जो तुम भोलेपन में हारे थे,
आसान नही था तुम्हे जीतना,
भगवान भी तुम्हे धोखे से मारे थे,

हो घायल गिरे धरा पर तुम,
सो गिरे कई अरमान,
नत मस्तक करतार थे,
रो रहे थे कई आसमान. 

'वो' हो जाता हूं ...

जब 'कर्ण' लिखता हूं,
'कर्ण' हो जाता हूं ...

जब 'इश्क़' लिखता हूं,
'इश्क़' हो जाता हूं ...

मैं इंसान हूं या किरदार कोई,
जब 'जो' लिखता हूं,
'वो' हो जाता हूं ...

जो दे दोस्त का साथ

ऐसे बहुत से मिलेंगे,
जो देंगे सच का साथ,
दोस्त कर्ण सा ढूंढिए,
जो दे दोस्त का साथ.