विशाल_सरोज
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रविवार, 23 मई 2021
बेकसूर ही तड़प रहे है तुम बिन
कटती नही रातें तुम बिन,
करवटें बदल रहे है तुम बिन,
कोई हसीं ख़ता ही की होती,
बेकसूर ही तड़प रहे है तुम बिन.
सोमवार, 17 मई 2021
हम खुद से ही शर्मिंदा हैं
जो पास तू मेरे होता,
मैं इस कदर न रोता,
कोई ऐसे रूठता है क्या,
कोई ऐसे जाता है क्या,
माना सब ख़ता है मेरी,
नही कोई भी ख़ता तेरी,
वापस आजा मेरे प्यार,
मुआफ़ कर दे मेरे यार,
तेरे लिए ही तो ज़िंदा हैं,
हम खुद से ही शर्मिंदा हैं.
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