विशाल_सरोज
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मंगलवार, 20 अप्रैल 2021
कहीं खो जाऊं
काश!
हिमालय की वादियों में,
सर्दी की एक सुबह,
खामोशी ओढ़े हुए देवदारों,
को छू कर आती,
ओस की शीतल फुहारों से,
भीगी सकरी सीढ़ियों को,
चढ़ कर बादलों में,
कहीं खो जाऊं.
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