विशाल_सरोज
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मुकम्मल
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रविवार, 23 मई 2021
बल बढ़ता गया
दल बढ़ता गया,
बल बढ़ता गया,
हौसलों पे हो सवार,
मन बढ़ता गया..
कुछ तूने किया,
कुछ मैंने किया,
कुछ अपने आप,
मुकम्मल हो गया..
न थकें कभी,
न रुकें कभी,
हिमालय को भी,
फतह करें अभी..
दल बढ़ता गया,
बल बढ़ता गया.
मंगलवार, 20 अप्रैल 2021
तू लिख कर मुकम्मल कर दे मुझे
बिखरा हूं कई पन्नों में, समेट ले मुझे,
कि मैं एक किताब हूं, पढ़ ले मुझे,
चाहता हूं तेरे इश्क़ में 'ख़त' हो जाना,
तू लिख कर मुकम्मल कर दे मुझे.
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