विशाल_सरोज
Personal collection of poems, shayari, etc
रविवार, 25 अप्रैल 2021
दो घड़ी की नींद से भी सस्ती है ज़िन्दगी
नंगे पांव ही चल पड़ी ज़िन्दगी,
हौसलों से सड़कें नापती ज़िन्दगी,
ये रेलें, ये पटरियां क्या जाने,
दो घड़ी की नींद से भी सस्ती है ज़िन्दगी.
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